Tuesday, June 29, 2010

विकास की राजनीति में फँसा बिहार

जाने क्या होगा वाद और विवाद में फँसे बिहार का? जहाँ एक तरफ बिहार की जनता एक अरसे के बाद कुछ चंद साल मौजूदा सरकार के शासन काल में चैन की साँसें ले रही थी कि अचानक आगामी चुनाव से पहले गठबंधन सरकार में पड़ती दरारों की वजह से वहाँ के लोगों में भी काफी असमंजस की स्थिति बनी हुई है ।

आज बिहार की स्थिति जहाँ सदृढ़ हो रही है, और विकास पुरूष के रूप में नितीश कुमार ने बिहार को एक अच्छी स्थिति में ला खड़ा किया है, वह काफी सराहनीय एवं असाधारण है, लेकिन आखिरकार आगामी चुनाव के पहले एक नये विवाद की वजह से बिहार की जनता में भी काफी असमंजस की स्थिति बनी हुई है । जहाँ एक तरफ स्वयं नीतिश कुमार ने बिहार में धर्म-जाति से ऊपर उठकर लोगों को विश्‍वास जताया है, वहीं चुनाव से पहले स्वयं नीतिश कुमार को भी राजद, कांग्रेस व लोजपा की तरह मुस्लिम तुष्टिकरण रास आ रहा है, तभी तो उन्हें नरेन्द्र मोदी व वरूण गाँधी द्वारा चुनावी रैली में हिस्सा लेने से ऐतराज है ।

स्वयं नीतिश कुमार बिहार में हुए चहुमुखी विकास के दावे के बल पर चुनाव लड़ना चाहते थे, वहीं अचानक उनका रुख कैसे बदल गया? सोचने वाली बात है, जिस गठबंधन के सहारे उन्होंने बिहार को सुशासन प्रदान किया है, वो आज अचानक चिंता का विषय कैसे बन गया?

कहीं ऐसा तो नहीं कि यह उन्हें कांग्रेस द्वारा दिये गये प्रलोभन व वाहवाही के नतीजे हैं या कहीं ऐसा तो नहीं कि उनकी नजर 16% मुस्लिम वोट बैंक पर है? या कहीं ऐसा तो नहीं कि उन पर भाजपा का अतिरिक्‍त दबाव या अंकुश हो, जो उनकी छवि को धूमिल कर रहा हो ।

इसमें कहीं न कहीं आपसी तालमेल की कमी कहें या जनता जनार्दन को मूर्ख बनाने वाली बात, साफ नजर आ रही है । अगर ऐसा नहीं है, तो नरेन्द्र मोदी के खिलाफ खोले गये मोर्चे की वजह की गुत्थी सुलझाना आसान नहीं होगा, क्योंकि जिस नरेन्द्र मोदी के बारे में वो बता रहे हैं, उस नरेन्द्र मोदी के बारे में बिहार क्या पूरे भारत की जनता की एक ही राय है, एक ही छवि है, और वो है विकास पुरूष की- क्योंकि स्वयं सदी के महानायक से लेकर वो सारे विकसित देश जिन पर हमारे देश की अर्थव्यवस्था टिकी हुई है, उनके कार्य करने के तरीके के लिए सराहना करते हैं । तो इससे एक बात तो अवश्य स्पष्ट हो जाती है, और वो है, “विकास पुरूष की होड़” जिससे भारत के इन मुख्यमंत्रियों में किसे विकास पुरूष के दर्जे का पैटेन्ट मिले ।

नितीश कुमार और भाजपा गठबंधन में पड़ती दरारों की वजह दूसरे ही तरफ इशारा कर रहा है, और वो है, सरकार द्वारा चुप्पी साध कर कराये गये चुनाव सर्वेक्षण जिसके तहत अगर JDU अगर अकेले चुनाव लड़े तो उसे 243 में से 120 सीटें हासिल हो सकती हैं । जो कि महज दो सीट ही बहुमत के लिए कम है, जिससे उसको 40 सीटों का फ़ायदा हो सकता है, जबकि अगर वह भाजपा गठबंधन के साथ लड़ती है, तो उसका फ़ायदा कम हो जायेगा । अगर दोनों गठबंधन में लड़ते हैं, तो BJP को 54 से 60 सीटों का तथा JDU को केवल 81-95 सीटों का फ़ायदा होता है, जो काफी कम है । JDU के फ़ायदे की वजह 16% मुस्लिम कोट बैंक है ।

अगर हम बिहार के विकास की बात करें तो इसमें कोई दो राय नहीं की संतोषजनक विकास हुआ है । जहाँ स्वयं नीतिश कुमार चहुमुखी विकास का दावा कर रहे हैं, वहीं दूसरी तरफ बिहार का भविष्य एक नये अंधकार की ओर अवश्य ले जा रहे है । अगर बिहार की मौजूदा स्थिति के बारे में बात करे तो सड़कों की मरमत्तीकरण से लेकर हर गाँवों में विद्युतीकरण का कार्य प्रगतिशील है, मगर चिकित्सा व्यवस्था और मेडिकल कालेजों में व्यवस्था जर्जर स्थिति में ही है ।

शिक्षा प्रणाली के विकास पर नजर डालें तो इसका हाल कुछ और ही दर्शाता है, केवल प्राथमिक शिक्षा में सुधार करने की कोशिश राजनीतिक तरीके से हुई हैं, क्योंकि वहां शिक्षामित्र जो पंचायत के प्रतिनिधियों द्वारा नियुक्‍त किये गये हैं, वे आयोग्य ही नहीं बल्कि प्रतिनिधियों से लेकर मंत्रियों के जेब खर्चे का परिणाम हैं । जिन्हें सिलेबस तक की जानकारी नहीं है, आंगनबाड़ी योजना के तहत एवं प्रधानमंत्री द्वारा दोपहर के भोजन की राजनीति की वजह से स्कूलों में शिक्षा नाम के शब्द को हटाकर खिचड़ी को तवज्जो दिया जा रहा है, जहां बच्चे शिक्षा नहीं राशन ग्रहण करने जा रहे हैं । जहां सरकार इसे कुछ लोगों को रोजगार देने का विश्‍वास दिला रही है, वहीं हजारों, लाखों बच्चों के भविष्य के साथ खिलवाड़ भी कर रही है, इसे हम क्या समझें विकास या और कुछ?

आज की तारीख में जहां सरकार लगभग कार्यकल पूरा करने जा रही है, वही उच्च शिक्षण संस्थानों में कोई सुधार नहीं हुआ है? ना ही माध्यमिक शिक्षा, ना ही उच्चमाध्यमिक तथा ना ही स्नातक और स्नातकोत्तर के संस्थानों में इजाफा, बल्कि इजाफा तो दूर उसके हालात और जर्जर होते जा रहे हैं, जिसके फलस्वरूप वहां के लोगों को आज की तारीख में भी अन्य राज्यों पर निर्भर रहना पड़ रहा है ।
रोजगार के विकास के बारे में बात करें तो वहां के लोगों को न तो कोई आश्‍वासन ही मिला है, न ही वहां कोई औद्यौगिक विकास ही हुआ है, जिसके लिए उन्हें, कभी शिवसेना से मार खानी पड़ती है, तो कभी असम में रेलवे भर्ती बोर्ड की परीक्षा में असमियों द्वारा प्रताड़ना भी सहनी पड़ती है, जवाब में सरकार कभी शिवसेना को तो कभी असम सरकार को जिम्मेदार ठहराती है ।

आज की तारीख में भी बिहार की जनता बिहार से अधिक अन्य राज्यों में रोजगार तलाशती है, जिसका उदाहरण है, बिहार से भारत के किसी भी कोने में जाने वाली ट्रेनों में बिहारियों की भीड़ । जिस विकास की दर का दावा यहां की सरकार कर रही है, वह केवल दस्तावेजों में ग्राफों तक ही, तथा मंत्रियों के लाइफस्टाइल पर ही झलक रही है, न की आज जनता को नये रोजगार मिल रहे हैं ।

हाँ, वहां प्रशासन अवश्य चुस्त-दुरूस्त हुआ है, एक संतोषजनक बात है कि अब वहां बाहुबली या तो जेल में हैं, या तो सरकार में मिल गये हैं, जिस गुंडा राज से बिहार की जनता त्रस्त थी वो अवश्य कम हुआ है, मगर नौकरशाह अवश्य जनता का शोषण कर रहे हैं, एक सामान्य कार्य के लिए भी थानाध्यक्ष से लेकर बड़े आला अफ़सर मुहमाँगी रकम माँगते हैं, जो कि ‘गुण्डाराज से कम भयावह नहीं है ।’
पूरे प्रदेश में सरकार के एक नये गठन के रूप में ’सैप’ अतिरिक्‍त पुलिस बल ने लोगों को राहत अवश्य पहुँचायी है, जिसका लगभग 70 फ़ीसदी खर्च केन्द्र सरकार वहन करती है और मात्र 30 फ़ीसदी खर्च राज्य सरकार वहन करती है । कुल मिला-जुला कर यह काफी सराहनीय है, क्योंकि जनता चैन से रात को सो अवश्य लेती है ।
अन्ततोगत्वा हम सरकार की कार्य प्रणाली पर अंगुली तो नहीं उठा सकते क्योंकि यहां की स्थिति इतनी बदत्तर हो चुकी थी कि जिसे सही करने में समय तो अवश्य लगेगा, लेकिन हम इसे संपूर्ण विकास, चहुमुखी विकास भी तो नहीं कह सकते । रह गई विकास की राजनीति की बात तो सरकार को ऐसे कदम अवश्य उठाने चाहिए जिससे आने वाली कोई भी सरकार चाहे वो किसी भी पार्टी की हो, उसका अनुसरण अवश्य करे न की उसको राजनीतिक फ़ायदे के लिए इस्तेमाल करे ।

क्योंकि जनता को क्या चाहिए शिक्षा, रोजगार, व्यवसाय करने की सुविधा इत्यादि, जिसे जनता सहज ग्रहण कर सके, तभी हो सकता है ’चहुमुखी विकास’ ।

और चहुमुखी विकास के लिए चाहिए कि नितीश कुमार की छवि जो लोगों ने देखी थी वे उसे बरकरार रखें, विकास को राजनीतिक हवा या धर्म और जाति के एजेंडे से न जोड़े, उसे अन्य पार्टियों के लिए छोड़ दें । मगर वे स्वयं और उनके चहेते गठबंधन तथा स्वयं अपने लोगों में दरार की वजह न बनें, वो किसी भी अन्य सरकार, नेता पर बयानबाजी न करें, जिससे उनकी छवि को नुकसान पहुंचे ।